बिजली विभाग के उस इंजीनियर की कहानी, जिसे प्रधानमंत्री बनाने की बात होती है

New Delhi: तब देश की आजादी के चार साल पूरे हो रहे थे। 1951 के मार्च महीने में बिहार के नालंदा जिले में एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया जो भारतीय राजनीति में सुशासन बाबू के नाम से जाना गया। वह बालक था कबीर राम लखन सिंह और परमेस्वरी देवी का बेटा नीतीश।

नीतीश पढ़ने में काफी अच्छे थे, इसलिए उन्हें बिहार के बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (इसे अब एनआईटी पटना के नाम से जाना जाता है) में दाखिला मिल गया। यहां से उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे बिहार राज्य बिजली बोर्ड में नौकरी करने लगे। लेकिन, मन नहीं लगने की वजह से वे नौकरी छोड़कर राजनीति में चले गए।

नीतीश बचपन से ही राजनीति और समाजसेवा के प्रति जागरुक रहे थे। लेकिन जयप्रकाश नारायण के संपर्क में आने के बाद उनकी राजनीति ने एक अलग पहचान पाई। वे 1974 एवं 1977 में जेपी के संपूर्ण क्रांति में शामिल हुए। वे पहली बार बिहार विधानसभा के लिए साल 1985 में चुने गये थे।

1989 में उन्हें बिहार जनता दल का सचिव चुना गया। इसी साल वे पहली बार लोकसभा के सदस्य के तौर पर चुने गये थे। 1990 में वे पहली बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में बतौर कृषि राज्यमंत्री शामिल हुए। 1998-99 में कुछ समय के लिए वे केन्द्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री भी रहे। इस बीच अगस्त 1999 में गैसाल में एक रेल दुर्घटना हुई, जिसके बाद उन्होंने मंत्री पद से अपना इस्तीफा दे दिया।

साल 2000 में वे पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन सिर्फ सात दिनों में त्यागपत्र देना पड़ा। उसी साल वे फिर से केन्द्रीय मंत्रीमंडल में कृषि मंत्री बने। मई 2001 से 2004 तक वे वाजपेयी सरकार में केन्द्रीय रेलमंत्री रहे। साल 2005 में लालू यादव के शासन से त्रस्त बिहार की जनता ने नीतीश पर अपना भरोसा जताया और वे मुख्यमंत्री बने।

इस दौरान उन्होंने बिहार में सड़क, सुरक्षा जैसी कई जरूरी चीजों में सुधार किया। उनके इस काम पर भरोसा जताकर बिहार विधानसभा चुनाव में 2010 में भी मुख्यमंत्री के तौर पर चुना गया। लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के खराब प्रदर्शन का जिम्मा लेते हुए उन्होंने कुर्सी छोड़ दी और अपने सहयोगी जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया। इसके बाद 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने पुराने प्रतिद्वंदी लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन कर चुनाव में भारी जीत हासिल की।

इन सबके बीच नीतीश ने शराबबंदी जैसे महत्वपूर्ण फैसले लिए जिसके कारण उनमें बिहार की जनता का विश्वास बढ़ा है। कथित भ्रष्टाचार के एक मामले में लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव का नाम सामने आने पर उन्होंने यह गठबंधन भी तोड़ लिया और अपने पुराने सहयोगी बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली।

फिलहाल नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। उनकी स्वच्छ छवि और प्रशासकीय गुणों के कारण उन्हें देश में प्रधानमंत्री के विकल्प के तौर पर देखा जाता है। अपने संघर्षों के कारण बिहार के बिजली विभाग का यह इंजीनियर देश की राजनीति का अहम हिस्सा बन गया है। हालांकि, इधर शराबबंदी की विफलता और मुजफ्फरपुर बालिका गृह दुष्कर्म कांड के बाद राज्य में कानून व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।