18 साल की उम्र में मदर टेरेसा ने छोड़ा माता-पिता का घर, पूरी जिंदगी की गरीबों-बीमारों की सेवा

New Delhi:  कहते हैं कि इंसान के दुनिया से गुज़र जाने के बाद उसे वक़्त के साथ बहुत जल्द भुला दिया जाता है, मगर कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें दुनिया उनके नेक कामों की वजह से चाह कर भी नहीं भुला पाती क्योंकि उनके काम की वजह से उनका व्यक्तित्व दुनिया पर ऐसा गहरा छाप छोड़ जाता है जिससे उन्हें हमेशा याद किया जाता। कुछ इसी तरह से 26 अगस्त 1910 में मेसिडोनिया के स्कोपजी शहर में जन्मी Agnes Gonxha Bojaxhiu (छोटा फूल) यानी ‘मदर टेरेसा’ ने भी दुनिया पर अपने सेवा-भाव से ऐसा छाप छोड़ा कि आज भी हमारे देश भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया उन्हें याद करती है। आज, 26 अगस्त को ‘मदर टेरेसा’ का जन्मदिन है जिसे पूरी दुनिया सेलिब्रेट कर रही है।

12 साल की छोटी उम्र में ही मां टेरेसा को ईश्वर की अनुभूति हुई। उनकी अंतरात्मा से आवाज आई कि मेरा उद्देश्य ईश्वर के दूत यीशू की तरह दुनिया में प्रेम और स्नेह को बढ़ावा देना है। इसलिए वह 18 साल की उम्र में स्कोपजी से अपने माता-पिता का घर छोड़कर भारत में उनके उद्देश्यों की तरह काम कर रहे नन के एक आयरिश समुदाय ‘सिस्टर आफ लोरेटो (Sister of Loreto)’ से जुड़ गईं। इसके बाद उन्हें डबलिन में कुछ महीने के प्रशिक्षण के बाद भारत भेज दिया गया, जहां उन्होंने 24 मई 1931 को एक नन के रूप में प्रतिज्ञा ली।

उन्होंने 1931 से 1948 तक कोलकाता के सेंट मैरी हाई स्कूल में पढ़ाने का काम किया, लेकिन वहां जब उन्होंने स्कूल के बाहर ग़रीबी और बीमारी से पीड़ित लोगों को देखा तो उनका दिल पसीज गया और उन्होंने मन ही मन स्कूल छोड़कर उनके बीच जाकर काम करने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने कान्वेंट स्कूल से अनुमति मांगी जिस पर स्कूल के वरिष्ठ अधिकारियों ने अपनी सहमति जता दी जिसके बाद उन्होंने कलकत्ता की ग़रीब मलिन बस्तियों में रहने वाले ग़रीबों की सेवा के लिए अपने आपको समर्पित कर दिया।

जब उन्होंने गरीबों की सेवा का प्रण लिया तो उनके पास ईश्वर द्वारा प्रदत्त तीव्र इच्छा शक्ति के अलावा कुछ नहीं था। शुरू में फंड की कमी के चलते उन्होंने खुले आसमान के नीचे मलिन बस्ती में रहने वाले बच्चों के लिए स्कूल खोला और अकेले ही पढ़ाने लगीं, कुछ दिन बीतने के बाद उनके मजबूत हौसलों को स्वयं सहायकों के रूप में बल मिला और वहीं के कुछ लोगों ने इस काम में उनकी मदद करनी शुरू कर दी। कुछ समय और बीतने के बाद उन्हें लोगों से आर्थिक मदद भी मिलने लगी जिससे उनका उनका काम बढ़ने लगा।

7 अक्टूबर 1950 को मदर टेरेसा ने ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ की स्थापना कि जिसका उद्देश्य उन लोगों की देखभाल और सेवा करना था जिनकी देखभाल और सेवा करने वाला कोई नहीं था। इसके बाद साल 1965 में ‘पोप पॉल 6’ के आदेश के बाद मदर टेरेसा की यह संस्था एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक परिवार बन गई।

मदर टेरेसा की संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ आज दुनिया के 123 देशों में काम कर रही है। इस मिशनरीज चैरिटी में लगभग 4500 सिस्टर कार्यरत हैं। दिसंबर 2015 में पॉप फ्रांसिस के रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा उन्हें संत की उपाधि दी गयी. उनके संत बनने की प्रक्रिया 4 सितम्बर 2016 को पूरी हुई। 19 अक्टूबर 2003 में उन्हें कलकत्ता सरकार ने ‘कलकत्ता की भाग्यवान टेरेसा’ की उपाधि दी। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट की उपाधि दी है।

बता दें कि मदर टेरेसा को 5 देशों द्वारा नागरिकता दी गई थी जिनमें आटोमन, सर्बिया, बुल्गेरिया, युगोस्लाविया और भारत शामिल हैं। अब तक उन्हें कई सारे अवार्ड्स से सम्मानित किया जा चुका है जिनमें पोप जॉन 23 द्वारा 1971 में दिया गया शांति पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय शांति और समझ के लिए 1972 में नेहरू पुरस्कार, 1979 में बेल्ज़ेन पुरस्कार, टेम्पलटन और मैगसेसे अवार्ड, भारत रत्न, पद्मश्री के साथ-साथ 1979 में शांति के लिए मिला नोबल पुरस्कार शामिल है।

मदर टेरेसा हमेशा कहती थीं कि कि दर्द और पीड़ा में मदद के लिए आगे बढ़ने वाले हाथ, प्रार्थना करने वाले होठों से कहीं ज्यादा बेहतर और पवित्र होते हैं।