जब अंग्रेजों की फ़ौज पड़ गई थी पीछे, तो शहीद भगत सिंह ने मंदिर के गुंबद में गुजारे थे कई दिन

New Delhi: वो दिन जब लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत किसी और दिन की तरह ही हुई थी, लेकिन फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था कि सुबह-सुबह ज़ोर की आंधी आई थी। यह वही दिन था जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी जानी थी। तो वहीं एक समय ऐसा भी था जब अंग्रेजों की फ़ौज भगत सिंह के पीछे पड़ गई थी और उनको मंदिर में शरण लेनी पड़ी थी। 

भारत की आजादी में अपना बलिदान देकर देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने वाले योद्धा भगत सिंह की जिंदगी से जुड़ा एक ऐसा वाक्या भी है जो बेहद रोचक और मजेदार है। आपको बता दें कि, शहीद भगत सिंह आजादी की अलख जगाने के साथ-साथ पहलवानी का शौक भी रखते थे। सहारनपुर में बिताए अल्पकाल में भगत सिंह ने यहां के एक आश्रम में कुश्ती भी खेली है। कुश्ती में जहां वह अपने साथियों को पछाड़ते थे तो कभी-कभी हार भी जाते। यहां स्थित फुलवारी आश्रम का कुश्ती स्थल देखते ही देशभक्तों के सामने शहीद भगत सिंह की तस्वीर उभर आती है। आज भी इस कुश्ती स्थल पर अनेक पहलवान जोर आजमाइश करते हैं। इस स्थल को आश्रम के संचालकों ने बहुत ही संजो-संवार कर रखा है। यहां पर पहलवानों को विशुद्ध भारतीय परंपरा के अनुसार ही कुश्ती खिलाई जाती है।

 

 

आजादी के आंदोलन के दौरान जब शहीद भगत सिंह के पीछे अंग्रेजी फौज लग गई तो शहीद भगत सिंह भाग कर सहारनपुर आ गए और यहां स्थित फुलवारी आश्रम के एक मंदिर की गुंबद में कई दिन तक छिपे रहे। अंग्रेजी फौज के जवानों ने जब पूरा आश्रम खंगाल लिया और शहीद भगत सिंह अंग्रेजी फौज के जवानों के हाथ नहीं आए तो अंग्रेजी सैनिक वापस लौट गए। सैनिकों के जाने के बाद जब शहीद भगत सिंह को यह भरोसा हो गया कि वह सुरक्षित हैं तो वह मंदिर की गुंबद से बाहर निकले।

गुंबद से बाहर निकलने पर उन्होंने सबसे पहले यहां पर स्नान किया। इसके बाद जब शहीद भगत सिंह ने आश्रम में स्थित कुश्ती स्थल को देखा तो उनके मन में बरबस ही यह विचार आया कि क्यों न वह भी कुश्ती खेलें। आजादी के इस दिवाने ने जब पहलवानों से कुश्ती खेलने का आग्रह किया तो पहलवान उन्हें इनकार नहीं कर सके थे।